Friday, January 18, 2008

मार्केटिंग - कॉमेडी कथाकथन भाग-३ पोस्ट १३

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आज ऑफिस जाने के लिए घरसे थोडा जल्दीही बाहर निकला. लेकीन एक आफत से छुटकारा पाओ तो वह दुसरा रुप अख्तीयार लेती है ... इसका मुझे थोडीही देरमें साक्षात्कार हूवा. बस आने के लिए आधा घंटा बाकी था. अब क्या किया जाए? सोचते सोचते याद आगया ...

" टाईम पास करने के लिए मार्केटिंगसे अच्छा दुसरा कोई तरीका नही ... कुछ खरीदने की जरुरत नही ... सिर्फ पूछ ताछ करते रहो ' किसी प्रसिध्द लेखक ने एक किताब मे लिख रखा है.

फिर क्या अगल बगल में देखा. बिना कुछ सोचे मै एक दुकान मे घुस गया. दुकानमालीक ने बडी मुस्कुराहट के साथ मेरा स्वागत किया. वहां लटकी हूई चिजे मै देखने लगा. लेकिन बहुत देर से सिर्फ मै चीजे निहार रहा हू ये देखकर उस दुकानमालीक की मुस्कुराहट ने अपना उग्र रुप अख्तीयार लिया.

" क्या चाहिये साब?' उसने पुछा.

फिरभी मै उसकी तरफ ध्यान नही दे रहा हू यह देखकर वह बोला " जल्दी बोलो साब ... सुबह सुबह टाईम खोटा मत करो'.

अब पाणी सर से उपर नही जाना चाहिए इसलिये मैने वहां लटके एक छातेका सहारा लिया.

" कितनेका है ?' मैने उस छाते को छूकर पुछा.

" दो सौ रुपए ...' उसने कहा

मैने अब छाता हाथ में लेकर निहारना शुरु किया. दुकान मालीक अंदर चला गया और उसके जगह उसका नौकर आकर खडा होगया.

मैने उस नौकर से पुछा " इसमें वे अलग-अलग रंग के होते है ना?'

कुछ ना बोलते हूए वह स्वयंचलीत खिलौने जैसा अंदर गया और चार पांच रंग के छाते ले आया.

मैने कहा "लेकिन इसपर सफेद रंग का डिजाईन भी होता है?'

" हां होता है ... लेकिन हमारे पास का वह माल खतम हो गया है' नौकरने कहा.

मैने चैन की सांस ली. चलो यहांसे खिसकने का यह अच्छा बहाना है.

दुकान से जाने के लिये पलटा तो अंदरसे दुकान मालीक की आवाज आई " क्यों क्या हूवा?'

मैने कहा, " मुझे नीले कलर का ... उसपर सफेद डिजाईनवाला छाता चाहिए था... लेकिन आपके यहां नहीं है शायद'

" कौन बोलता है नही है...' वह नौकर पे चिल्लाया. लेकिन नौकर वहां नही था. वह शायद अंदर गया था.

उसने नौकर को आवाज दिया, " टॉमी...'

पता नही इतने देरमे नौकर कहां गायब हो गया था.

उसने गुस्से से नौकर को आवाज दिया " कहा मर गया ... टॉमी...'

गलीमें घुमता हुवा एक आवारा कुत्ता दौडते हूये वहां आगया.

कुत्ते को देखकर तो दुकान मालीकको और गुस्सा आगया.

उसने वहां बैठे हूवे दूसरे एक लडके को पास बुलाया. शायद वह उसका नया ट्रेनी नौकर था.

" बगल के दूकानसे ब्लू कलरके और सफेद डिजाईनवाले चार पाच पीस लेके आना ... जल्दी' मालीकने आदेश दिया. वह लडका हिंन्दी मे शायद थोडा कच्चा था. इसका ज्ञान हमें थोडी ही देर में हूवा. उसको दूकान मालीकने जो भी कहा बराबर समझमें नही आया. लेकिन गुस्साये हूवे दूकान मालीकसे पुछनेकी उसकी हिम्मत नही बनी. वह भागते हूए वहांसे दो चार दूकान छोडके चला गया. उसको वहां एक सलून की दूकान दिखाई दी. उसने अपना दिमाग लगाया " बगल की दूकान यानी... बगल साफ करने की सलून की दूकान. उसको डाउट आया भी की यहां छाते कैसे होंगे. लेकिन मालिकने कहां तो जरुर होंगे. वह अंदर चला गया. अब उसने सलूनवालेसे छाते मांगने के बाद क्या हूवा होगा इसकी कल्पना ना करना ही अच्छा है. यह सब कहानी नौकरने वापस आकर जब अपना दाया गाल सहलाते हूए हमें बताई तब हमें मालूम पडी . इतनेमें दौडते हूवे वह पहलावाला नौकर वहां आगया.

" ... कहा मर गया था कुत्ते ...'

इतनी देर से जो दुकान मालीक को बडी आशा से निहार रहा था वह कुत्ता ... दूम दबाकर भाग गया.

" वो शर्माजीके दुकानसे ब्लू कलर के और सफेद डिजाईनवाले चार पांच पिस लेके आ ...' कहते हूवे मालीकने उसे दौडाया. नौकर दौडता हूवा चला गया. मै अब वहां से खिसकनेका दूसरा बहाना ढूंढने लगा. मैने कहा, " अगर टाईम लगता है तो रहने दो .. मै बादमे कभी आउंगा...वैसेभी बारीश को अभी बहुत टाईम है'

" टाईम कायका साब ... दो मिनट का काम है' उसने लगभग मेरी कलाई पकडते हूवे कहा. अब तो भागनेकाभी चांन्स नही था. वह नौकर दौडते हूये छाते लेकर आया. उसने सब छाते मेरे सामने रखे टेबलपर पटके. मुझे यकिन हैकी उसने पटकते वक्त उस टेबल को जरुर मेरा सर समझा होगा... और छातोंके बंडल को उस दुकान मालीक का सर. उसमें से एक लेकर मैने पुछा " ये कितने का है'

उसने वह छाता उलट पुलटकर देखा. एक जगह कुछ तो लिखा हूवा था. उसके साथ मै भी पढने की कोशीश करने लगा. एक जगह कुछ 1625 ऐसा लिखा हूवा देखकर तो मेरी धडकन ही तेज होगई.

" ढाईसौ रुपए..' दुकान मालिकने झट से कहां.

मै गौर करके देखने लगा की ढाईसौ कहां लिखा है. ढाईसौ कही भी नही लिखा था. फिर मै मन ही मन 1625 को 2 से 3 से 4 से डीव्हाईड करने की कोशीश करने लगा . जितनी मुझे आती थी उतनी सारी गणीती प्रक्रीयायें मैने 1625 पर करके देखी . लेकिन किसी भी सुरतमें ढाईसौ आने का नाम नही ले रहा था. शायद मेराही णीत कच्चा हो. इतनेमें एक दुसरे कस्टमर से दुकान मालीक का ध्यान बंट गया तो मै उस छाते को वहां वैसा ही रखकर वहांसे खिसकने लगा. पिछे से दुकान मालीककी आवाज आई "अब क्या हूवा?'

मैने जाते जाते पलटकर कहा " महंगा है'

" अरे तो आप बोलीये ना आपको कितने में चाहिये ' उसने कहां.

" जाने दो .. मुझे लेना ही नही' मेरे मुंह से निकल गया.

ये सुनते ही दुकान मालीक आग बबुला हो गया. वह गुस्से से बोला " अरे ऐसे कैसे लेने का नही...

... इतनी देर से हमारा टाईम खाया ... और अब बोलता है लेने का नही... इस दुकान को क्या बगीचा समझ रखा है ... बैठे तो बैठे नही तो चले गए.

मैने फिर अपने आपको संभालते हूए कहा "लेकिन बहुत महंगा है'

" तो तुम बोलो ना कितने मे चाहिए... देखुतो तुम्हारी हैसीयत क्या है?' वह "आप' से "तुम' पर आ गया था.

मैने डरते हूए आजूबाजू देखा. आखिर इज्जत का और हैसीयत का सवाल था.

मैने धिमेसे कहा " पचत्तर मे दो'

बुरासा मुंह बनाकर वह बोला "पचत्तर... रुपए या पैसे'

" पचत्तर रुपए' मेरे गलेसे अटकती हूई आवाज आई. वह गुस्सेसे सब छाते बटोरने लगा. वह आगे कुछ कहकर अपना और अपमान ना कर दे इसलिये मै जाने के लिए मुडा.

" ए रुक... जाता किधर है ... ' वह तुच्छतासे बोला.

" ये ले ... सुबह सुबह बहुनीका टाईम है इसलिए... नही तो पचत्तर रुपएमें इसका डंडा भी नही आता ... वैसे भी हम सुबह आये भिखारी को भी तो खाली जाने नही देते...' ऐसा कहते हूए उसने वह छाता लगभग मेरी ओर फेंक दिया. मैने क्रिकेटर की चपलता से उस छाते को कॅच किया. कॅच भी मैने ही किया और आऊट भी मै ही हुवा था चुपचाप 75 रुपए निकालकर दुकान मालिकके हाथ में थमा दिए और अपने मस्तक का पसीना पोछते हूए दुकान से बाहर निकला. असलमें पसीना पोंछनेसे अपने चेहरेके भाव छिपानेकी जरुरत मुझे ज्यादा महसुस हूई थी. ऍग्रेसीव मार्केटिंग किसे कहते है वह आज मुझे अच्छी तरह से समझ में आया था.

... last part will be posted tomarrow.

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1 comment:

  1. बहुत जोरदार लिखा है । एग्रेसिव पर जबर्दस्त लिखना क्या होता है हमें समझ आ गया । :) :D
    कृपया इस एग्रेसिव अक्षर चेक को हटा दीजिये । हम जैसे चक्व्यूह में फंसा महसूस करते हैं ।
    घुघूती बासूती
    :(
    देखा फेल हो गए । पर अब जब टिप्पणी लिखी है तो करे बिना तो नहीं जाएँगे ।
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete

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